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उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: सीपी राधाकृष्णन के नाम में छिपा है बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक?

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उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 सीपी राधाकृष्णन के नाम में छिपा है बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक
Image credit: aajtak.in

उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 की रणभूमि तैयार है, और बीजेपी ने अपने पत्ते खोल दिए हैं। महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को एनडीए का उम्मीदवार घोषित कर पार्टी ने एक बार फिर अपनी रणनीतिक चतुराई दिखाई है। जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे के बाद बीजेपी ने इस बार ऐसा चेहरा चुना है, जो न केवल पार्टी की वैचारिक जड़ों से गहराई से जुड़ा है, बल्कि दक्षिण भारत और ओबीसी समुदाय को साधने का भी माद्दा रखता है। क्या इस चयन में धनखड़ के कार्यकाल का असर है? आइए, इस सियासी दांव के पीछे की कहानी को समझते हैं।

धनखड़ के बाद नया चेहरा

जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद बीजेपी ने साफ कर दिया था कि वह अब कोई जोखिम नहीं लेगी। धनखड़ का कार्यकाल विवादों से भरा रहा, खासकर विपक्ष के साथ उनके टकराव ने सुर्खियां बटोरीं। इस बार बीजेपी ने सीपी राधाकृष्णन को चुना, जो तमिलनाडु के तिरुपुर से हैं और ओबीसी समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह चयन न केवल क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को संतुलित करता है, बल्कि एक गैर-विवादास्पद और अनुभवी नेता को सामने लाता है। राधाकृष्णन का लंबा राजनीतिक सफर, जिसमें आरएसएस कार्यकर्ता से लेकर महाराष्ट्र के राज्यपाल तक की भूमिका शामिल है, उन्हें इस पद के लिए मजबूत दावेदार बनाता है।

राधाकृष्णन क्यों बने पसंद?

बीजेपी का यह फैसला ‘एक तीर से कई निशाने’ साधने जैसा है। राधाकृष्णन की साफ-सुथरी छवि और संघ से गहरा नाता उन्हें पार्टी के लिए आदर्श उम्मीदवार बनाता है।

  • वैचारिक निष्ठा: राधाकृष्णन 17 साल की उम्र से ही आरएसएस और जनसंघ से जुड़े रहे हैं। उनकी विचारधारा बीजेपी की मूल नीतियों से मेल खाती है, जो धनखड़ के मामले में नहीं थी।
  • साफ छवि: चार दशकों के राजनीतिक करियर में राधाकृष्णन का नाम किसी विवाद से नहीं जुड़ा। कोयंबटूर से दो बार सांसद और तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने संगठन को मजबूत किया।
  • संवैधानिक अनुभव: झारखंड, तेलंगाना, पुदुच्चेरी और महाराष्ट्र में राज्यपाल के रूप में उनके कार्यकाल में कोई सियासी टकराव नहीं हुआ, जो उन्हें राज्यसभा अध्यक्ष की भूमिका के लिए उपयुक्त बनाता है।

बीजेपी का यह कदम यह भी दर्शाता है कि वह अपने मूल कार्यकर्ताओं को बड़े पदों पर देखना चाहती है, जिससे कार्यकर्ताओं में भी उत्साह का संदेश जाता है।

धनखड़ फैक्टर का असर

जगदीप धनखड़ का उपराष्ट्रपति कार्यकाल उनके आक्रामक अंदाज और विपक्ष के साथ टकराव के लिए जाना गया। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में ममता बनर्जी के साथ उनकी तनातनी और फिर उपराष्ट्रपति के तौर पर विपक्ष के साथ कई विवादों ने बीजेपी को सबक दिया। धनखड़ की पृष्ठभूमि जनता दल और कांग्रेस से थी, और बीजेपी में उनका प्रवेश बाद में हुआ। इसके उलट, राधाकृष्णन संघ की विचारधारा में रचे-बसे हैं। बीजेपी ने इस बार ऐसा चेहरा चुना, जो न केवल विवादों से दूर रहे, बल्कि संसद के ऊपरी सदन में संतुलन और सहमति बनाए रख सके। यह कदम बीजेपी की उस सोच को दर्शाता है कि संवैधानिक पदों पर अब ‘अपने लोग’ ही होंगे।

विपक्ष का समर्थन और दक्षिण का दांव

राधाकृष्णन की उम्मीदवारी ने विपक्ष को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। उनकी सौम्य और समावेशी छवि ने विपक्षी दलों, जैसे उद्धव ठाकरे की शिवसेना और डीएमके, को भी प्रभावित किया है। शिवसेना सांसद संजय राउत ने राधाकृष्णन की तारीफ करते हुए उन्हें अनुभवी और गैर-विवादास्पद बताया। डीएमके ने भी इस चयन को एनडीए का सकारात्मक कदम माना।

राधाकृष्णन का तमिलनाडु से होना बीजेपी के लिए दक्षिण भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने का एक सुनहरा अवसर है। तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, और राधाकृष्णन का चयन डीएमके और अन्य क्षेत्रीय दलों को चुनौती दे सकता है। 2007 में उनकी 19,000 किलोमीटर की रथ यात्रा ने तमिलनाडु में बीजेपी की जड़ें मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी।

पीएम मोदी का समर्थन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राधाकृष्णन को बधाई देते हुए कहा कि उनकी मेहनत और समाजसेवा का लंबा इतिहास है। खासकर तमिलनाडु में उनके जमीनी स्तर के काम ने उन्हें लोकप्रिय बनाया है। मोदी ने विश्वास जताया कि राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति के रूप में देश को प्रेरित करेंगे। यह चयन तमिलनाडु के ओबीसी समुदाय को साधने के साथ-साथ दक्षिण भारत में बीजेपी की पैठ बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है।

क्या यह बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक साबित होगा? आप इस चयन के बारे में क्या सोचते हैं? हमें कमेंट में बताएं!

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