महाराष्ट्र की सियासी गलियारों में इन दिनों एक नया तूफान खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा वकील आरती साठे को हाई कोर्ट जज के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश ने सियासी हलचल मचा दी है। विपक्ष ने इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए इसे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर हमला बताया है, जबकि सत्तारूढ़ बीजेपी ने इस कदम का बचाव किया है। यह विवाद केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की सियासत और न्यायिक प्रणाली के बीच एक गहरे टकराव का प्रतीक बन गया है।
विपक्ष का कहना है कि आरती साठे 2023-24 के दौरान बीजेपी की प्रवक्ता रह चुकी हैं। उनका यह दावा है कि किसी राजनीतिक दल से जुड़े व्यक्ति को इतने महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरे में डाल सकता है। यह पहली बार नहीं है जब महाराष्ट्र में न्यायिक नियुक्तियों को लेकर सवाल उठे हैं, लेकिन इस बार का विवाद कुछ खास है। जैसे ही यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर भी #JusticeForJudiciary और #MaharashtraPolitics जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे, जिससे यह साफ हो गया कि यह मुद्दा जनता के बीच भी चर्चा का विषय बन चुका है।
दूसरी ओर, बीजेपी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पार्टी का कहना है कि आरती साठे ने जनवरी 2024 में बीजेपी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था और उनकी नियुक्ति पूरी तरह से उनकी कानूनी योग्यता और अनुभव के आधार पर हुई है। बीजेपी नेताओं ने यह भी तर्क दिया कि विपक्ष इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से तूल दे रहा है ताकि जनता का ध्यान उनकी अपनी नाकामियों से हटाया जा सके। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई पुरानी कहावत को दोहराए, “जब खुद का घर शीशे का हो, तो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।”
यह विवाद उस समय और गहरा गया जब कुछ विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की पारदर्शिता पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि ऐसी नियुक्तियों में राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिए और सख्त नियमों की जरूरत है। दूसरी ओर, बीजेपी समर्थकों का मानना है कि यह नियुक्ति महाराष्ट्र की सियासत में एक नया अध्याय शुरू कर सकती है, जहां योग्यता को प्राथमिकता दी जाएगी, न कि राजनीतिक निष्ठा को।
इस पूरे प्रकरण ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश में एक बहस छेड़ दी है। क्या न्यायपालिका वाकई में पूरी तरह स्वतंत्र है? या फिर सियासत का साया इस पर भी पड़ रहा है? जैसे-जैसे यह विवाद बढ़ता जा रहा है, जनता की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह मामला सियासी रंग लेगा या फिर न्यायिक प्रणाली की गरिमा बरकरार रहेगी।
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